Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 35–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verses 35–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 35-40
संस्कृत श्लोक
शबरीणां शरीरेषु शीर्णपर्णोत्करे गिरौ ।
नाराचैः पर्णशबरैर्वनाली नगरायते ॥ ३५ ॥
अब्ध्यद्रिसरिदम्भोदवनलेखाङ्गिका दिशः ।
त्वत्प्रतापबलैरेता हसन्तीवार्करश्मिभिः ॥ ३६ ॥
अत्रोपशैलवनवीथिषु पुष्पशय्या विद्याधरीविरचिताः परिवर्णयन्ति ।
पार्श्वद्वयस्थपरिवृत्तपदात्समुद्राद्व्यावृत्तमुग्धवनितापुरुषायितानि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त गम्भीरता, निर्मलता
ओर विस्तार के वैभव से अपने में प्रतिबिम्बित आकाश को मानों हृदय से निकाल कर दिखला रहे
थे, वे जलचर पक्षियों के आकाश सहित प्रतिबिम्ब को रत्नराशियों की किरणों से कर्बुरित अपने
हृदयो से धारण कर रहे थे, अतएव कोश के बीज में स्थित भँवरों को धारण करनेवाले पद्मों के
सदश दीख रहे थे, तरंगों से चंचलतापूर्वक उछले हुए वायुओं के झोंकों से आकाश तल पर आघात
कर रहे थे, मध्यवर्ती पर्वतो की कन्दराओं के गाम्भीर्योँ से वे प्रलयकाल के मेघों के निवासरूप थे,
गुहाओं में आवर्तो की गुडगुडाहट ध्वनियों से वे वज्र की भाँति भीषण थे, अपने को पी डालनेवाले
अगस्त्यो को और बड़वानलों को अपने गुहारूपी उदरो मे खूब ग्रसे हुए दर्शा रहे थे, जलरूपी वनों
को आकाश में पहुँचे हुए दर्शा रहे थे, जिनमें प्रचुर जलकण ही पुष्प थे, तरंगराशियाँ ही वृक्ष थे,
छोटी लहरें ही मंजरी (बौर) थीं, उड़े हुए मछली आदि जीवजन्तुओं से युक्त चल रही तरंग-
राशियों को आकाश के शत्रो से कटने पर खण्ड रूप से नीचे गिरे हुए टुकड़े से दर्शा रहे क्षार समुद्रो
को उन्होंने देखा