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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

आकाश तक पहुँचे हुए पर्वतों के शिखरो पर तटों के आगे पूर्ववर्णित रीतियों से तरंगों द्वारा स्वागत कर रहे क्षार-सागर के तट पर विपश्चित्‌ सेना के पहुँचने पर चारों ओर इलायची, लग, मौलसिरी, ओंवला, तमाल, हिंताल ओर ताड के पत्तों के ताण्डवों से विभक्त भँवरों के समान काली वनपंक्ति शोभित हुई