Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
रत्नपुष्पभरापूर्णरक्तपल्लवपाणयः ।
भवन्तं पूजयन्तीव लतादारान्विता द्रुमाः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तरकस, म्यान आदि अपने निवास गूहों में, रथो, हाथियों और वृक्षों के समूहों मे अस्त्र सायंकाल
के समय निद्रालु पक्षियों के समान लीन होकर निश्चेष्ट हो गये