Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
कूजत्कुञ्जकठोरगह्वरनदीक्वत्कारवत्कीचकस्तम्भाडम्बरमूकमौकुलिकुलः क्रौञ्चाचलोयं गिरिः ।
एतस्मिन्प्रबलाकिनां प्रचलतामुद्वेजिताः कूजितैरुद्वेल्लन्ति पुराणरोहणतरुस्तम्भेषु कुम्भीनसाः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर से रत्न-मिश्रित तरगों से निरन्तर व्याप्त समुद्र को आकाशचारी जीव,
भूमि के रत्नकंकण की भ्रान्ति से देखते हैं