Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
एषोऽब्धिधौतकलधौततटाधिरूढभोगीन्द्रभोगपरिवेष्टितचन्दनोऽगः ।
विद्याधरीवदनपङ्कजदीप्तिपुञ्जहेमीकृताखिलशिलो मलयाभिधानः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चन्दन
के वृक्षो से व्याप्त, अतिशय शोभाशाली, अति उन्नत यह मलय पर्वत -रूपी मल्ल (पहलवान)
प्रतिमल्लरूपी सागर की लहररूपी भुजाओं की लपेट को जीतने के लिए उद्यत-सा हो रहा
है