Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
पश्यामलेन्दुरामृतनवनीतशरीरसुन्दरीवलितः ।
पितुरुत्सङ्गे कुरुते जललीलां क्षीरवारिनिधौ ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें से एक हाथी भाग्यवश अगाध जल में भँवरों की पकड़ में आकर जलकणों
की मूसलाधार बौछारों से दिशाओं को व्याप्त कर डूबने के कारण जल से भर जाने से सिर
उठाने में असमर्थ हो सूँड़ ऊपर कर मर रहा है, जरा दृष्टिपात कीजिये