Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
नृत्यन्ति मत्तकलकोकिलकाकलीकाः पश्यामले मलयसानुनि बालवल्ल्यः ।
लोलालिजालनयनारुणपत्रपाणिपुष्पा मधूत्सवविलासविशेषवत्यः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सागर
विविध प्राणियों से पूर्ण, जल से भरे हुए तथा पर्वतों से ऊँचे नीचे विषम हैं वैसे ही सब द्वीपभूमियाँ
भी हैं