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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verses 18–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verses 18–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 18-20

संस्कृत श्लोक

वातायनोदरगवाक्षकवाटकक्षाद्वाराननैरिह पुराण्युदिते पठन्ति । श्वभ्राभ्रकन्दरदरीवनवेणुरन्ध्रवर्गेण मन्दर इवामृतसिन्धुमिन्दुम् ॥ १८ ॥ एतच्छृङ्गं हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभिर्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः । प्रालेयाद्रेः प्रतितटवनं प्रोत्पतत्यभ्रमूर्ध्वं वज्रस्तम्भो गगनसुतलोत्तोलनायेव भूमेः ॥ १९ ॥ गङ्गातरङ्गहिमसीकरशीतलानि विद्याधराध्युषितचारुशिलातलानि । पुष्पाभ्रसंवलितपुष्पितकाननानि राजन्विलोकय महेन्द्रगिरेस्तटानि ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे इन्द्र असुरों से रक्षा करते हुए मणियों को अपने अन्दर रखते हैं वैसे ही मन्थन के समय देवता और असुरों द्वारा हृत-सर्वस्व सागर मन्थन के समय देवताओं से परिरक्षित जिन बहुत सी मणियों को अपने अन्दर रखता है और महातेजरूप अतएव पाताल से भी भलीभाँति दिखाई दे रहीं जिन मणियों को प्रतिबिम्बरूपसे असत्य सी बनाकर अन्दर छिपाकर रखता है, उन मणियों में से एक जिस मणि को प्रतिदिन पश्चिम सागर में रखने के लिए आकाश में फेंकता है, उससे दिन होता है, ऐसी मेरी मति है