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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

देशान्तरेषु विततानि वनान्तराणि पुष्पस्थलान्युपवनान्यथ पत्तनानि । तीर्थेषु पूतभुवनानि जलानि दृष्ट्वा दौर्भाग्यमीतिरपयाति जवानुविद्धा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे यात्रा में लोगों का कलकल ध्वनि से युक्त परस्पर समागम होता है वैसे ही विविध दिशाओं और देशों के जलों का कलकल शब्द से मिश्रित परस्पर समागम होता है