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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

श्रृङ्गाणि पूरितदिगन्तरमण्डलानि श्वभ्राभ्रकन्दरनिकुञ्जकुलाकुलानि । व्योमोपमान्यपि च वारिधिकुण्डलानि दृष्ट्वा गलन्ति कुकृतानि बृहत्तराणि ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

युद्ध में उत्साह रखनेवालों में जलचर ही श्रेष्ठतम होते हैं, ऐसा मेरा तर्क है, क्योंकि पूर्व और पश्चिम सागर के संगम में इनका सदैव परस्पर आस्फालनवश कभी भी युद्ध शान्त नहीं होता