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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

रम्याश्चन्दनवीथयो हि मलये विन्ध्ये मदान्धा गजाः कैलासे नृप पादजाति कनकं चन्द्रं महेन्द्राचले । दिव्याश्चौषधयस्तुषारशिखरे सर्वत्र रत्नानि वै सन्त्यन्धाखुवदेष जीर्णसदने व्यर्थं जनो जीर्यते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

रतिखेद से श्रान्त हुई मछलियों के लहरों की चोटियों पर नाचने में जो आवर्तो का सा (जलभ्रमियों का-सा) विलास हुआ उसको उड़ाये हुए जलकणरूपी या जलकणसहित पारितोषिकरूप मोतियों से वेष्टित करता हुआ प्रभु की भाँति यह वायु आ रहा है, देखिये