Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
सोन्नतं जगदिवोरुतटाकं वारिणा विवलितं तिमिरेण ।
प्रस्फुरन्ति च युगान्त इवैता विद्युतः शफरिका इव लोलाः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
नदीरूपी मोतियों की मालाओं के बीच-बीच में गे हुए मेघरूपी उत्तमोत्तम
चंचल रत्न सागर के कण्ठ मेँ सबसे बढ़कर लम्बमान होने से आपस की टक्कर से खनखना
रहे हैं