Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मारुताः सुरतक्रान्तकान्तानिःश्वसितैरिमे ।
वहन्ति वृद्धिं गन्धं च लवं स्वर्गादिव च्युताः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ये बिजलीरूपी चंचल नेत्रवाले
मेघरूपी हरिण आम, धूलिकदम्ब और कदम्बो से परिपूर्णं गन्धमादन की कन्दराओं में प्रवेश
कर रहे हैं