Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
कुवलयकुवलयविकचनकुसुमलताविदलनोद्यता मृदवः ।
घनपटपाटनपटवो विधुतोपवना वहन्त्यमी पवनाः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
हिमालय की गुफाओं से निकले हुए, मेघो और समुद्र की तरंगों को छिन्न-
भिन्न करनेवाले तथा लताओं को नचा रहे मन्द-सुगन्ध शीतल पवन बह रहे हैं