Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
संध्याभ्रलेशानुपयन्ति वाता नभस्तले कोमलकम्पनेन ।
नृपाङ्गणे पुष्पविचित्रलेखानुवासिते भृत्यवरा इवैते ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे देव,
आम ओर कदम्ब की शाखाओं की चोटियों के सम्पर्कं से सुगन्धवाले गन्धमादन पर्वत के ये
वायु सागर की तरगों को वेष्टित कर रहे हैं