Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
वलिततामरसा मृदुशीकराः शशिकरोत्करवीचिविभेदिनः ।
सदहना इव तापमयाः पुरो विरहिणीषु वनावनिवायवः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवान् शिवजी के विकसित प्रमदवन के केले के कर्पूर से सुरभित, मेघो को कपा रहे ओर
कैलास के कमलाकरों को हिला रहे वायु बह रहे हैं