Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तालीतमालबकुलाकुलतुङ्गशृङ्गमेकीकृताकृति वनं तरलं विभाति ।
अभ्याहतं जलनिधेस्तरलैस्तरङ्गैस्तीरान्तलग्नघनशैवलजालकल्पम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कोई बालक अपने घर की धूम्र -पंक्तियों
को पंखे से कम्पित करता है वैसे ही यह सागर वायु से हिलाई गई वृक्ष ओर लतारूपी भुजाओं
के अभिनय से नाच रही, स्वादतुल्य अपने जलकणों से व्याप्त, पर्वतो की ऊपर की भूमि पर
बैठी हुई मेघपंक्ति को कम्पित करता है, कृपया देखिये