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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीयद्विषामितोऽपि शरणार्थिनः शिखरिपत्रिणः शेरते । इतोऽपि वडवानलः सह समस्तसंवर्तकैरहो विततमूर्जितं भरसहं च सिन्धोर्वपुः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय के समय वृद्धि को प्राप्त समुद्र के प्रवाहो से जिनकी शाखाओं में शंख उलझ गये थे, ऐसे ये तटवृक्ष चन्द्रबिम्ब के समान अमृत रस से भरे ओर सफेद फलों से पूर्ण कल्पवृक्ष से शोभित हो रहे है, तनिक दृष्टिपात कीजिये