Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
कल्पाभ्रद्रुमवीरुदुन्नतिदृशां कर्तासि धर्तासि च आकाशेन्दुघनार्ककिन्नरमरुत्स्कन्धामराणामपि ।
सर्वं रम्यमसंकुलाशय समस्वच्छस्वभावस्य ते यत्त्वेतद्दहनत्वमङ्ग तदहो मुख्याय खेदाय नः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई पार्श्वचर सागर में प्रतिविग्बित चंचल वन््रविम्ब को दशाति हुए कहता हैं /
हे राजन्, अमृत-मथने से उत्पन्न हुए नवनीत के सदृश स्वयं निर्मल चन्द्रमा वैसी ही सुन्दर
शरीरवाली सुन्दरियों से परिवृत्त होकर क्षीरसागर में प्रतिबिम्बित हो पिता की गोद में जलक्रीडा
करता है