Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
पूर्णस्यापि जगद्दोषैः सर्वदैवाविकारिणः ।
खस्य मन्ये बुधस्येव सुखं सर्वार्थशून्यता ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हाथियों के गण्डस्थलं से चुए हुए मदजलों से मिश्रित अतएव चंचल
भ्रमर-वृन्द द्वारा चवाया हुआ सा पीडित कणसमूह सागर मेँ मानों रोता है