Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
आकाश काशसि तु यत्र शशाङ्कबिम्बं त्वत्कीर्णकज्जलतमो मलिनोऽसितत्वम् ।
सङ्गान्न यन्नयसि तत्खलु चित्रमुच्चैः को नाम वान्तरमलं मलिनीकरोति ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, यहाँ इस क्रौंचाद्रि
के तटपर कोमल कनकलता से निर्मित निकुज में कान्त के साथ क्रीडा कर रहीं ललनाओं के रत्यवस्था
में चंचल कंकणों से किया हुआ कानों के लिए अतिमधुर होने से रसायनपान के तुल्य दूर तक फैले
भूषणशब्द को आप सुनिये