Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
आन्दोलयस्यविरलं गगनार्कमङ्के नारायणं च शशिनं च तथेतराणि ।
तेजांसि भासुरतडित्प्रभृतीनि साधो चित्रं तथापि न जहासि यदान्ध्यमन्तः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यह क्रौचाचल पर्वत है । इसमें रहनेवाले कौए निकुंजों, शिलामय प्रदेशों (पथरीली
भूमिय), गुफाओं और नदियों की तालध्वनियों से युक्त बज रहे बाँसों के गीतों को सुनने की तीव्र
इच्छा से चुपचाप हो गये हैं । इसमें इधर-उधर उड़ रहे मयूरों की केकाध्वनियों से भयभीत हुए साँप
खोखलेवाले पुराने वृक्षों के तनों में अपने शरीर को छिपाये रहते हैं ॥