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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अकिंचनोऽपि कार्याणि साधयत्यातताशयः । अन्तःशून्यमपि व्योम सर्वस्योन्नतिकारणम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई दूसरा पार्श्वचर चन्द्रोदय के समय नगर में हर्षवक्श हुए खिड़की आदि से जनघोष और मन्दर पर्वत मे गर्त आदि के घोष के उपमानोपमेय भाव से उत्प्रेक्षा करता हैं / इस प्रदेश में नगर, चन्द्रमा के उदित होने पर खिड़की, झरोखे, दरवाजे आदिरूपी मुँहों से अमृतसिन्धुभूत चन्द्रमा की ऐसे ही स्तुति करते हैं जैसे कि मन्दराचल गर्त, मेघ, गुफा, बनैले बाँसों के छिद्रों से अमृतसागररूप चन्द्रमा की स्तुति करता है