Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
न तृणसलिलं नैव ग्रामो न नाम च पत्तनं न च दलभरस्निग्धच्छायस्तरुर्न च सत्प्रपा ।
तदपि गगनाध्वानं सूर्यः प्रयाति दिने दिने विषममपि यत्प्रारब्धं तत्त्यजन्ति न सात्त्विकाः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
करोड हिमालय के तटों से मेघों की उड़ान में पवन द्वारा किये गये शिखरहरण की तथा भूमि से
उठे हुए आकाश-पाताल को तोलने के खम्भे की उत््रेक्षा करता € /
आकाश और पाताल की गुरुता और लघुता के परीक्षार्थ तोलने के लिए भूमि के वजस्तम्भकी
नाई हिमालय की तटवनभूमियों से मेघ ऊपर उड़ता है । ऊपर की ओर मुँह की हुईं मुग्ध (भोली)
सिद्धांगनाओं द्वारा बड़े आश्रय के साथ देखा गया वायु मानों इस पर्वत के शिखर ले जाता है
क्या ?