Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
दिग्भित्तिबद्धमिदमूर्ध्वतलान्तरिक्ष मुर्वीतलं घनपुराचलभूरिभाण्डम् ।
विद्याधरामरमहोरगजालकारं लोकौघसंसरणसंघपिपीलिकाढ्यम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
दिशाओं
के मध्यवर्ती अवकाश को पाट देनेवाले, मेघ, गुफा और निकुंजों से परिपूर्ण आकाशतुल्य पर्वतशिखरों
को तथा निर्मल सेतुबन्धादि तीर्थो को देखकर बड़े-बड़े ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं