Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कालः क्रिया च भुवनं भवनं चिराय नामाधितिष्ठत इवोपवनं विकासि ।
आशङ्क्यते प्रतिदिनं ननु नष्टमेव नाद्यापि नश्यति च केयमहो नु माया ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
राजन्, मलयाचल में चन्दनवृक्षों की मनोहर श्रेणियाँ हैं, विन्ध्याचल में मतवाले हाथी हैं, कैलास में
श्रेष्ठ सुवर्णं है, महेन्द्राचल में चन्द्र (हीरा) है, हिमालय मे दिव्य औषधियाँ हैं, सब स्थानों में रत्न
हैं, किन्तु भाग्यहीन पुरुष उनको न देखकर अन्धे चूहे की तरह जीर्ण -शीर्णं घर में वृथा दिन विताता
है