Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
युगलकम् ।
खं मन्ये पादपादीनां रोधयत्यधिकोन्नतिम् ।
अकर्तुरेव महतो महिम्नोदेति कर्तृता ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
मेघरूपी अन्धकार से आवृत ये दिशाएँ प्रलय काल में जल से व्याप्त अन्तरिक्ष लोक तक
भरे जगद्रूपी एक तालाब-सी मालूम पड़ती हैं ओर उनमें चंचल बिजलियाँ तालाबों में मछलियाँ-
सी फुरती हैं