Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
आधारमायततरं त्रिजगन्मणीनामङ्गे बिभर्त्यमितमन्तरशेषवस्तु ।
व्योमैव चिद्वपुरहं परमेव मन्ये यत्रोदयास्तमयमेति जगद्भ्रमोऽयम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वर्ग से च्युत हुए जीव पूर्व पुण्यवासना के लेश को धारण करते हैं वैसे ही सुरत से
क्लान्त (श्रान्त) कान्ताओं के निश्वासों से वायु वृद्धि ओर सुगन्धि को धारण करते हैं ।। २७॥ भूमण्डल
के कमलों को खिलाने ओर पुष्पलताओं को खोलने में सचेष्ट, मेघरूपी वस्त्रों की चीरफाड (छेदन-
भेदन) में दक्ष तथा उपवनं को कम्पित करनेवाले ये मन्द सुगन्ध शीतल पवन बहते हैं