Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
वनावनौ वनचरचारुकामिना मनोहरद्रुमगहनेषु गीयते ।
इतो गिरेः शिरसि विलोक्यतेऽमुना वियोगिना पथि वहता रसाकुलम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
फूलों की विविध विचित्र पंक्तियों से सुसज्जित (फूलों से सजाये गये) राजा के आँगन में मन्त्री आदि
श्रेष्ठ सेवक फूलों को कुचले बिना जतन से चलते हैं वैसे ही ये वायु गगनतल में मन्द-मन्द कम्पन
के साथ सान्ध्य मेघों के समीप जाते हैं