Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
विजिगीषोः पुनः प्राप्ते संकटे प्रकटे रणे ।
धर्म्यं विराजते युद्धं यौवने सुरतं यथा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
राजन्, देखिये, ये कुलशैल, दूर से देखने
पर जिनके मध्यवर्ती मार्गसमूह दूसरों को नहीं दिखाई देते, परस्पर सटे होने से चारों ओर नगर के
प्राकार (चहार दीवारी) जैसे प्रतीत होते हैं । सागरों में प्रवेश कर रहीं प्रवेशत्वरा से लड़खड़ाती हुई
नदियाँ वस्त्र के भीतर लगी हुई महीन सफेद सूत की किनारी-सी लग रही हैं