Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
लोकैरनिन्दिता लक्ष्मीरारोग्यं श्रीसमन्वितम् ।
धर्म्यं युद्धं परार्थेन जीवितस्योत्तमं फलम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्,
सामने दसों दिशाएँ, जिन्होंने चारों ओर पहाड़ों की चोटियों पर मेघों को फैला रक्खा है, जिनकी
मेघ के सदृश श्यामल आकृति है, पक्षियों के कलरव ही जिनके वार्तालाप हैं, जिनकी वन-
श्रेणिरूपी भुजलताएँ लताओं से वर्षाए गये फूलों से अलंकृत हैं, आपके अन्तःपुर की रानियों को
हँस रही सा मालूम पड़ती हैं