Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
नानाविकासिकुसुमोत्करसारलब्धवल्लीदलावलनशीतलिताध्वगाङ्गाः ।
साम्भःप्रथप्रसरणेन तरत्तरङ्गा ग्रामा गिरीन्द्रगहनेषु जयन्ति चन्द्रम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
सूर्य का रथ अस्ताचल पर्वत में ऊँचे नीचे सुवर्ण मय शिखरों की नोकों से टकराने के कारण सुन्दर
जोड़ों में जर्जरित हो पहियों की घरघराहट से तीक्ष्णतर कूवरध्वनिवाला होकर नीची भूमि में उतर
रहा है