Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
सहचरा ऊचुः ।
पश्याद्रिसानाविव बिम्बितं स्वं पुरःसरो मारपुरःसरो यः ।
कह्लारपद्मोत्पलजालनालललद्विचित्रारवपक्षिवीतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुचरों ने कहा : महाराज, यहाँ पर युद्धरत सीमाप्रान्त के राजाओं के अस्त्र-शस्त्रों की
राशियाँ चमचमा रही हैं । चतुरंगिणी सेना विलक्षण रीति से इधर-उधर चल रही है, कृपाकर
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सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पन्द्रह सर्ग समाप्त एक सौ सोलहवाँ सर्ग संग्राम, आकाश, वियोगी, पर्वतग्राम, पर्वत-गुफा के मेघ और कौओं का वर्णन ।