Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
विविक्तहृदयाम्भोजं हृदयाह्लादनं परम् ।
रसवत्स्वादु भातीदं सरः सत्संगमोपमम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, हे आकाश, तुम सूर्य को निरन्तर अपनी गोद
में झुलाते हो, केवल सूर्य को नहीं, भगवान् नारायण, उनके अनुचर अन्यान्य देवता, चन्द्रमा,
अन्यान्य ग्रहों तथा चमकीले बिजली आदि तेजो को भी अपनी गोद में झुलाते हो, फिर भी अपने
अन्दर के अन्धकार का (कालिमा का) त्याग नहीं करते, यह महान् आश्चर्य है