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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

बिम्बितेन मरुव्योम्ना भातीदं सौम्य निर्मलम् । शास्त्रार्थपरिणामेन महतामिव मानसम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे आकाश, तुम मलिन हो, जहाँपर चन्द्रबिंब छिद्ररूप तुमसे व्याप्त हो काजल के तुल्य काला हुआ वहाँपर कलंक के बहाने मैला सबको प्रत्यक्ष दिखाई देता है । ऐसी अवस्था में तुम अपने सम्पर्क से सम्पूर्ण चनद्रविम्ब को जो काला नहीं करते यह बहुत बड़े आश्चर्य की वात है । अथवा मलिन के संसर्ग से जिसके अन्दर भी मैल हो, वही बाहर भी मलिन किया जाता है जो अन्दर निर्मल है उसे कौन मलिन कर सकता हे ?