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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

जन्तोरिवास्य मनसो जलजातिबन्धजीर्णस्य जर्जरदशालहरीभ्रमेण । आवर्तवृत्तिवलितान्यतिसंततानि को नाम संकलयितुं कमलानि शक्तः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

से तुम्हारा कलेवर लाल हो जाता है, रात्रि मेँ तुम काले बन जाते हो । अथवा सदा कुछ भी सद्‌ वस्तु को धारण नहीं करते हो, इसलिए सकल वस्तुओं से रिक्त हो अतः तत्त्वज्ञानीरूप तुम्हारे चरित्र को कोई नहीं जानता है