Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
चित्रं विजृम्भितमहो जडसंगमस्य पद्मोपि यन्निजगुणानगुणानिवैषः ।
अन्तः प्रगोपयति कण्ठतले निवेश्य सर्वस्य दर्शयति दुर्भगकण्टकौघम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे आकाश, तुम अकिचन हो तुम्हारे पास कुछ नहीं है,
फिर भी विपुल बुद्धिवाले तुम सब कार्यों को, अवकाश प्रदान द्वारा, सिद्ध करते हो, अन्तःशून्य
हो फिर भी सबकी उन्नति के कारण हो