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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सितासिताभ्यां रूपाभ्यां कमलोत्पलखण्डयोः । वैसादृश्यं भवेत्किंतु समा जडजडैतयोः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

कोर्ड दूस पार्श्वचर त्रिभुवन का एक जीर्ण शीर्ण गृह के रूप में वर्णन करता है / देव, इस त्रिभुवनरूपी जीर्ण गृह को देखने की कृपया कीजिये, जो दिशारूपी दीवारों पर खड़ा है, अन्तरिक्ष लोक जिसकी छत है, भूमि जिसका निचला भाग है, मेघ, नगर और पर्वत जिसके बड़े-बड़े बर्तन आदि गृहोपकरण हैं, विद्याधर, देवता तथा महान्‌ नाग जिसमें मकड़ी नाम के कीड़े हैं एवं जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज इन चार प्रकार के प्राणिवर्गरूपी चींटियों की बारात से भरा है