Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
साम्यं न फुल्लविपिनेन सरःसु याति व्योम्ना न तारकयुतेन न चेन्दुवृन्दैः ।
नृत्यद्वधूविहसिताननशोभयैति फुल्लस्य पङ्कजवनस्य नवोदिता श्रीः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे माली और मालिन-पति-पत्नी विकसित (फले-फूले) बाग की रक्षा
करते हैं वैसे ही इस प्रकार के इस त्रिभुवनरूपी भवन की काल और क्रियारूपी पति-पत्नी चिरकाल
से रक्षा करते हैं । यद्यपि काल और क्रिया इसकी रक्षा नहीं करते, अपितु प्रतिदिन इसके नाश की
ही आशंका करते हैं तथापि यह आजतक नष्ट नहीं हुआ । नष्ट होता भी है तो प्रवाह से फिर उग
जाता है । अहा नष्ट होता हुआ भी नष्ट नहीं होता, यों विरुद्धधर्मवान होने से यह इन्द्रजाल के
सदश है