Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
चूतचारुचमत्कारं चञ्चरीकाश्चरन्ति ये ।
त एव सचमत्कारा इतरे जातिपूरणम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें लाखों जगत् विलीन होते हैं और जिससे उत्पन्न होते हैं उस आकाश को
शून्य कहा जाता है, आकाशशून्यतावादी के ऐसे प्रौढ पाण्डित्य की बलिहारी है