Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
मत्ता मधुमदामोदैः पुष्करेषु रणन्ति ये ।
तुष्टानामितरस्वादैर्भ्रमराणां हसन्ति ते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में
सब भूत विलीन होते हैं, आकाश से ही उत्पन्न होते हैं और आकाश में ही स्थिर रहते हैं, इसलिए
"जन्माद्यस्य यतः" यह शास्त्रसिद्ध ईश्वरलक्षण आकाश में ही दीखता हे, इसलिए आकाश ही ईश्वर
हे । आकाश ईश्वर से भिन्न है, ऐसा भेद उन्मत्तता को प्राप्त (पागल) वादी ने किया है