Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
येनोषितं विरुतमुल्लसितं प्रसुप्तं पद्मोदरेषु शशिकोटरकोमलेषु ।
भृङ्गः स एष शिशिरे विरसेषु भावं कष्टं करिष्यति कथं तरुपुष्पकेषु ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अग्नि से विनगारियो की तरह आकाश से ही जगत् के जन्म, स्थिति और लय मानते हो
तो आकाश जड़ नहीं है, किन्तु विद्व्योगरूप मैं ही हूँ. मुझमें ही सव उत्पन्न हुआ हैं, मुझमें ही
स्थित हैं और सव मुझमें ही लय को प्रात होता ह/ वह अद्वितीय ब्रह्म में हूँ इस आशय की भगवती
श्रति से में ही ईश्वर हूँ. यो तटस्थ ईश्वर पक्ष खण्डनार्थ हैं, ऐसा कोड तत्वज्ञानी वहाँ पर कहता है /
जिसमें सृष्टियाँ अग्नि से उत्पन्न हुई चिनगारियों की नाई उत्पन्न होती हैं, नष्ट होती है, लीन
होती हैं और आविर्भूत होती हैं, आदि, मध्य और अन्तशून्य एक निर्मल आकाश मैं ही हूँ, ईश्वर नामका
नैयायिकों का अभिमत तटस्थ कारण दूसरा नहीं है