Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अफुल्लमल्लिकोद्दाममुकुलोपरि षट्पदः ।
दृश्यते कालरुद्रेण शूले प्रोत इवान्धकः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें यह जगद्भ्रान्ति का उदय और
अस्त होता है, जो निस्सीम आकाश अपने शरीर में अशेष वस्तुओं को धारण करता है तथा त्रैलोक्यरूपी
मणियों का विस्तृत आधार है वह आकाश ही चिन्मय पर ब्रह्मरूप है ऐसा मेरा विश्वास है