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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

आस्वादयन्विविधपुष्पमधूनि भृङ्ग नित्यं भ्रमन्सकलशैललतागृहेषु । नाद्यापि तुष्यसि किमङ्ग दुराशयोऽसि मन्ये न सारमुपगच्छसि वा वनेभ्यः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई पार्थ॑वर्ती पर्वत पर विशेष कौदुक दिखनाता हुआ कहता है / पर्वत के शिखर पर वनभूमि में वनेचर सुन्दर कामी पेड़ के रमणीय झुरमुट में जो गीत गाता है, नीचे मार्ग में चल रहा यह वियोगीपुरुष उस गीत को सुनकर सिंगार रसाकुल हो ऊपर देखता है