Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
कमलकुलकवलकोविद गच्छ सरो मधुप मा रूढम् ।
बदरदरीषु विदीर्णं देहं कुरु कण्टकक्रकचैः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
दसय अनुचर कैसा ही दूसरा कोतुक दिखाता हुआ कहता हैं।
हे नाथ, पर्वतशिखर के ऊँचे पेड़ के कमलपुटसदृश निकुंज में वियोगवश दुःखी उत्सुक
विद्याधरो की स्त्री ने लंबी साँस लेकर रूँधे हुए कण्ठ से जो गीत गाया उसके नीचे चल रहा
राही उच्छवासपूर्वक उसे सुनकर झूले की नाईं झूल रही चंचल बुद्धि से न आगे जाता है और
न उसके अनुगामी ही उसे बुलाते हैं, यह बड़ा आश्चर्य है