Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अतसीकुसुमे कुवलयदलवलये विकसिते च तापिच्छे ।
परभागमेहि मधुना तासु विसदृशीव पण्डितः पुरुषः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
सामने पर्वत-शिखर के वृक्ष
में पत्तों की आड़ में वियोगिनी अतएव बार-बार आँसू गिरा रही वह विद्याधरी साँस छोड़कर
बिना कोई तिलक लगाये ही मधुर स्वर से हे नाथ, मैंने आपके गोदरूपी घर में चिबुक पकड़कर
हँसते हुए आपके चुम्बन का स्मरणकर बार-बार उसका आस्वादन कर यहाँ पर इन कलमुँहे
वर्षों को क्लेश से बिताया इस आशय के गाने गाती है