Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
पश्यैषा नाभिनलिनीकेसरैः पालिता श्रिया ।
हंसमालामलावल्ली सामगायनकूजिता ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यों वह वहीं पर बैठी है, ऐसी आशंका होने पर कहता हैं /
इसके युवक सुन्दर पति को (विद्याधर को) मुनि ने किसी अपराधवश शाप से बारह वर्ष तक
के लिए वृक्ष बना दिया है, उन्हीं वर्षों को गिन रही यह यहीं पर बैठी है । उत्कण्ठित होकर उसी
अपने पतिरूप वृक्ष के आश्रित होकर गाती है । हे राजन् मार्ग में वियोगी पथिकों के मुँह से यह
खबर मुझे मिली है