Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
समानेष्वाकराकारजातिचेष्टाशनादिषु ।
हंसस्य राजहंसस्य दूरमत्यन्तमन्तरम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, इस सुवेलपर्वत शिखर पर सूर्य चमचमा रही पूरी सोने की शिला
तटग्रदेश में चंचल सागर की तरंगराशियों से व्याप्त बड़वानल के कण को तरंग मालुम पड़ती
हे