Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
शुक्लपक्षस्थितो व्योम्नि कुमुदाकरभासकः ।
आह्लादयति चेतांसि हंसश्चन्द्र इवोत्थितः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
राजन्, पर्वतो पर अहीरों की टोली के घरों की शोभा देखिये । इनके हर एक घर
निकटवर्ती मोटे-मोटे मेघों से ढके हैं घरों की आस पास की भूमिय में वनवृक्ष फूले हैं, ढाक के
पेड़ों के झुरमुटों से इन्होंने आकाश को पाट रखा है