Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
भृङ्गलोलालकलता रणत्सारसनूपुरा ।
वर्तुलावर्तनाभीका चलद्वीचिविलोचना ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
मृगो द्वारा झूलने के लिए झूला बनाई गई लताओं से हलचल वाले जंगल के
अन्दर गुफाओं में गा रही शबरियों के मुँहों पर सतृष्ण टकटकी लगाये हुए अतएव श्रृंगारिक
चेष्टावाले किरात सुन्दर भोले-भाले मृगों को शत्रु की तरह कैसे मारते हैं ? ओहो, अन्यत्र दृष्टि
लगाये ओर अन्यमनस्क शबरो की चंचलनिशाने को वेधने की चतुराई तथा ऐसे अवसर पर भी
निदयता विस्मय पैदा करती है । अथवा मृगों से कम्पित लताओं के सदृश पुलिन्द-ललनाओं के
नेत्रों की सुन्दरता हरण और लतापल्लव भोजनरूप धर्म का उनमें परिज्ञान होने से उन्हें शत्रु समझ
रहे किरात दयायोग्य समय में भी उन्हें निदयता पूर्वक मारते हैं क्या ? यों उत्प्रेक्षा है